गयाजी तीर्थ में ‘दशगात्र’ और ‘सपिंडीकरण’ के बाद महा-श्राद्ध: वार्षिक श्राद्ध बनाम गया श्राद्ध का अंतर और नियम

गयाजी में सपिंडीकरण और त्रिपिंडी अनुष्ठान के बाद विष्णुपद वेदी पर महा-श्राद्ध संपन्न करते श्रद्धालु
गया महातीर्थ में गरुड़ पुराण व धर्मसिंधु के अनुसार दशगात्र-सपिंडी उपरांत अक्षय तृप्ति हेतु वैदिक पिंडदान।

सनातन धर्म की अंत्येष्टि और पितृ कर्म व्यवस्था में मृत्यु के उपरांत जीवात्मा के उद्धार हेतु सोलह संस्कारों में से अंतिम संस्कार यानी ‘अपर क्रिया’ का अत्यंत विस्तृत विधान मिलता है। किसी परिजन के गोलोकगमन के पश्चात परिवार के समक्ष कई धर्मशास्त्रीय और व्यावहारिक दुविधाएं उत्पन्न होती हैं। विशेष रूप से गरुड़ पुराण, निर्णयसिंधु, धर्मसिंधु और वायु पुराण के नियमों को लेकर श्रद्धालुओं में असमंजस की स्थिति बन जाती है।

गयाजी महातीर्थ में पिंडदान के संदर्भ में सबसे अधिक पूछे जाने वाले और संवेदनशील प्रश्न निम्नलिखित हैं:

  • “मृत्यु के उपरांत 10वें दिन होने वाले ‘दशगात्र’ (Dashgatra) और 11वें-12वें दिन होने वाले ‘सपिंडीकरण’ (Sapindikarana) का वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ क्या है?”

  • “क्या 1 वर्ष पूरा होने यानी ‘बरसी’ (वार्षिक श्राद्ध / Annual Shraddh) से पहले गयाजी जाकर पिंडदान किया जा सकता है?”

  • “यदि किसी दिवंगत आत्मा का सपिंडीकरण श्राद्ध संपन्न न हुआ हो, तो क्या उसका गया श्राद्ध शास्त्रसम्मत माना जाता है?”

  • “घर पर किए जाने वाले प्रतिवर्ष के वार्षिक श्राद्ध और गयाजी के ‘महा-श्राद्ध’ (अक्षय श्राद्ध) में मूल अंतर क्या है?”

  • “क्या गयाजी में एक बार पिंडदान कर देने के बाद घर पर पितृपक्ष या पुण्यतिथि पर श्राद्ध करना बंद कर देना चाहिए?”

इस विस्तृत लेख में हम दशगात्र से लेकर सपिंडीकरण तक की सूक्ष्म क्रियाओं, वार्षिक श्राद्ध बनाम गया श्राद्ध के तकनीकी भेदों, धर्मशास्त्रों के श्लोक प्रमाणों और विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषण चार्ट को गहराई से समझेंगे।

लेख की मुख्य विषय-सूची (Table of Contents)

  • 1. दशगात्र और एकादशाह-द्वादशाह: प्रेत-देह निर्माण की 10 दिवसीय यात्रा

  • 2. सपिंडीकरण का गूढ़ रहस्य: ‘प्रेत’ से ‘पितर’ बनने का दिव्य संक्रांति काल

  • 3. वार्षिक श्राद्ध (बरसी) बनाम गयाजी महा-श्राद्ध का तुलनात्मक विश्लेषण

  • 4. क्या 1 वर्ष (बरसी) से पूर्व गयाजी में पिंडदान हो सकता है? धर्मशास्त्रों का स्पष्ट निर्णय

  • 5. सपिंडीकरण के अभाव में गयाजी में ‘त्रिपिंडी श्राद्ध’ का महत्व और विधान

  • 6. गया श्राद्ध के उपरांत घर पर वार्षिक श्राद्ध करने के 5 अनिवार्य नियम

  • 7. गयाजी में श्राद्ध अनुष्ठान: सही समय, तिथियां और पंडा व्यवस्था

  • 8. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs), 5-Minute Checklist और निष्कर्ष

1. दशगात्र और एकादशाह-द्वादशाह: प्रेत-देह निर्माण की 10 दिवसीय यात्रा

गरुड़ पुराण के ‘प्रेत कल्प’ के अनुसार, जब स्थूल शरीर पंचतत्व में विलीन होता है, तो जीवात्मा अंगूठे के आकार (अंगुष्ठ मात्र) के सूक्ष्म शरीर में आ जाती है।

  • दशगात्र का विज्ञान: मृत्यु के प्रथम दिन से लेकर 10वें दिन तक प्रतिदिन दिए जाने वाले 1-1 पिंड से उस सूक्ष्म आत्मा के नए आतिवाहिक (भोग) शरीर के विभिन्न अंगों का निर्माण होता है (जैसे प्रथम दिन सिर, द्वितीय दिन ग्रीवा-कंधे, पंचम दिन नाभि, दशम दिन क्षुधा-पिपासा आदि)।

  • एकादशाह और द्वादशाह: 11वें दिन आद्य-श्राद्ध और वृषोत्सर्ग (बैल का दान) होता है तथा 12वें दिन ‘सपिंडीकरण’ का मुख्य संस्कार संपादित किया जाता है। इसके बिना आत्मा को भूख-प्यास सहने और आगे की यात्रा करने की क्षमता नहीं मिलती।

2. सपिंडीकरण का गूढ़ रहस्य: ‘प्रेत’ से ‘पितर’ बनने का दिव्य संक्रांति काल

धर्मसिंधु के अनुसार, ‘सपिंडीकरण’ वह वैदिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा दिवंगत आत्मा का संबंध उसके पूर्ववर्ती तीन पीढ़ियों के पितरों (पिता, दादा, परदादा) के साथ संयुक्त किया जाता है।

  • पिंडों का मिलन: इस संस्कार में प्रेत के नाम का एक लंबा पिंड बनाया जाता है और तीन पिंड पूर्वज पितरों के रखे जाते हैं। सोने या चांदी के तार/कुशा से प्रेत पिंड को काटकर तीनों पितृ पिंडों में एक-तिहाई भाग मिलाकर विलीन कर दिया जाता है।

  • संज्ञा परिवर्तन: सपिंडीकरण पूर्ण होते ही वह जीवात्मा ‘प्रेत’ योनि की संकीर्णता से मुक्त होकर पूज्य ‘पितर’ की श्रेणी में शामिल हो जाती है और उसे पितृलोक में प्रवेश का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

3. वार्षिक श्राद्ध (बरसी) बनाम गयाजी महा-श्राद्ध का तुलनात्मक विश्लेषण

क्र. सं. (S.No.) मानदंड / विषय (Parameter) घर पर वार्षिक श्राद्ध / बरसी (Annual Shraddh) गयाजी महा-श्राद्ध (Gaya Ji Maha-Shraddh)
1 श्राद्ध का स्वरूप (Nature of Ritual) सामयिक, आवर्ती (प्रतिवर्ष तिथि पर दोहराया जाने वाला) अक्षय, शाश्वत एवं सकल कुलों की अंतिम मुक्ति हेतु
2 स्थान की महत्ता (Location Specificity) गृह प्रांगण, नदी तट अथवा स्थानीय देवालय गया तीर्थ की पावन 45+ वेदियों (विष्णुपद, फल्गु, अक्षयवट)
3 अधिष्ठाता शक्ति (Presiding Deity) गृह देवता, विश्वेदेव एवं कुल पितृगण साक्षात भगवान गदाधर (विष्णु), धर्मराज एवं ब्रह्मा जी
4 पुनरावृत्ति (Repetition Requirement) जीवनपर्यंत प्रत्येक वर्ष की पुण्यतिथि पर अनिवार्य गयाजी में जीवनकाल में केवल 1 बार पूर्ण विधि से पर्याप्त
5 उद्देश्य एवं फल (Spiritual Fruition) वर्ष भर के लिए पितरों की क्षुधा-पिपासा तृप्ति 21 कुलों का उद्धार, जन्म-मरण से मुक्ति व वैकुंठ वास

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4. क्या 1 वर्ष (बरसी) से पूर्व गयाजी में पिंडदान हो सकता है? धर्मशास्त्रों का निर्णय

निर्णयसिंधु और स्मृति मुक्तावली के अनुसार सामान्य नियम यह है कि जब तक दिवंगत आत्मा का 1 वर्ष का काल (12 मासिक श्राद्ध, ऊन-षाण्मासिक और वार्षिक बरसी) पूर्ण न हो जाए, तब तक उसे तीर्थ श्राद्ध के लिए नहीं ले जाया जाता।

  • विशेष शास्त्रीय छूट (अपवाद): यदि सपिंडीकरण संस्कार 12वें दिन ही विधिपूर्वक संपन्न कर दिया गया हो, तो विशेष परिस्थितियों में (जैसे पितृपक्ष का आगमन, कोई गंभीर पारिवारिक कारण या गया यात्रा का सुअवसर) योग्य विद्वान ब्राह्मण की अनुमति से ‘अपकर्ष सपिंडी’ मानकर 1 वर्ष से पूर्व भी गयाजी में पिंडदान किया जा सकता है।

  • शास्त्रों की सर्वोच्च प्राथमिकता: निर्णयसिंधु में स्पष्ट उल्लेख है कि गया तीर्थ में पहुँचने पर कोई काल दोष नहीं रहता—“गयायां सर्वकालेषु पिण्डं दद्याद् विचक्षणः” अर्थात् गयाजी में काल, नक्षत्र या वर्ष की बाध्यता से परे होकर भी पितृ तृप्ति का अनुष्ठान किया जा सकता है।

हमने दशगात्र, सपिंडीकरण का रहस्य, विस्तृत तुलनात्मक चार्ट और 1 वर्ष पूर्व गया श्राद्ध के नियमों को विस्तार से समझा।)

5. सपिंडीकरण के अभाव में गयाजी में ‘त्रिपिंडी श्राद्ध’ का महत्व और विधान

धर्मसिंधु और निर्णयसिंधु के अनुसार, यदि किसी कारणवश किसी दिवंगत परिजन की मृत्यु के उपरांत 12वें दिन ‘सपिंडीकरण’ संस्कार संपन्न न हो सका हो (जैसे अकाल मृत्यु, जल में डूबना, दुर्घटना, शव न मिलना, या पारिवारिक उपेक्षा), तो वह जीवात्मा ‘प्रेत’ योनि में ही भटकती रहती है। ऐसी स्थिति में गयाजी पहुँचकर सीधे सामान्य पिंडदान करने से पूर्व ‘त्रिपिंडी श्राद्ध’ (Tripindi Shraddh) का विशेष विधान किया जाता है।

  • तीन प्रकार के प्रेत दोषों का शमन:

    त्रिपिंडी श्राद्ध मुख्य रूप से तीन प्रकार के कष्टकारी दोषों को शांत करने के लिए किया जाता है:

    • सात्विक प्रेत (Brahma Rakshasa/Brahma Pret): कुल के विद्वान या पूज्य पूर्वज जिनकी आत्मा असंतुष्ट रह गई हो।

    • राजसिक प्रेत (Kshatriya/Vaishya Pret): सांसारिक वासनाओं, धन-संपत्ति या अधूरी इच्छाओं में अटकी आत्माएं।

    • तामसिक प्रेत (Tamasic/Pishach Pret): अकाल मृत्यु, आत्महत्या, दुर्घटना, हत्या या जघन्य कष्टों से मृत आत्माएं।

  • तीन विशेष अन्नों से पिंड निर्माण:

    त्रिपिंडी अनुष्ठान में तीन अलग-अलग अन्नों के सम्मिश्रण से विशिष्ट पिंड तैयार किए जाते हैं:

    • जौ का आटा (Barley): सात्विक प्रेत की शांति और देवलोक प्राप्ति हेतु।

    • चावल का आटा (Rice): राजसिक प्रेत की तृप्ति और पितृलोक में प्रवेश हेतु।

    • तिल व उड़द का आटा (Sesame & Black Gram): तामसिक व पिशाच योनियों के भीषण कष्टों के तत्काल शमन हेतु।

  • त्रिदेवों का आवाहन:

    इस अनुष्ठान में भगवान ब्रह्मा (श्वेत वर्ण), भगवान विष्णु (पीत वर्ण) और देवाधिदेव महादेव रुद्र (रक्त/श्याम वर्ण) का कलशों पर आवाहन कर साक्षात ‘धर्मराज’ के समक्ष प्रेत-योनि से पूर्ण मुक्ति का महा-संकल्प लिया जाता है। इसके उपरांत ही आत्मा सामान्य श्राद्ध का पिंड ग्रहण करने योग्य बनती है।

6. गया श्राद्ध के उपरांत घर पर वार्षिक श्राद्ध करने के 5 अनिवार्य नियम एवं भ्रांतियां

श्रद्धालुओं में यह सबसे बड़ी भ्रांति पाई जाती है कि “यदि हमने गयाजी में जाकर पिंडदान और सुफल करा लिया, तो अब भविष्य में घर पर कभी भी वार्षिक श्राद्ध (बरसी) या पितृपक्ष में तर्पण करने की आवश्यकता नहीं है।” धर्मशास्त्रों (विशेषकर निर्णयसिंधु और हेमाद्रि) में इस विषय पर अत्यंत स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं:

  1. गया श्राद्ध ‘अक्षय तृप्ति’ है, ‘कृतघ्नता’ का परवाना नहीं:

    गयाजी में पिंडदान करने से पूर्वजों को अक्षय तृप्ति और मोक्ष मिलता है, परंतु जीवित संतान का कर्तव्य समाप्त नहीं होता। पितृपक्ष में प्रतिवर्ष अपने पितरों की तिथि पर जल-तर्पण, ब्राह्मण भोजन और गौ-ग्रास देना संतान का ‘नित्य धर्म’ (Daily/Annual Duty) है।

  2. पिंड निर्माण की बाध्यता समाप्त होती है:

    गयाजी में विधिवत श्राद्ध संपन्न कराने के बाद घर पर प्रतिवर्ष आटे या चावल के ‘गोलाकार पिंड’ (Pinda) बनाना अनिवार्य नहीं रहता। आप केवल ‘तर्पण’ (तिल-जल अर्पण), ‘पंचबलि’ (गाय, कुत्ता, कौवा, चींटी, देव) और ‘ब्राह्मण भोजन/सीधा दान’ करके वार्षिक श्राद्ध पूर्ण कर सकते हैं।

  3. पितृपक्ष (आश्विन कृष्ण पक्ष) में तर्पण का नित्य क्रम:

    पितृपक्ष के 16 दिनों में गया श्राद्ध कर चुके साधक भी अपने पितरों के निमित्त दक्षिणाभिमुख होकर तांबे के पात्र से 3-3 अंजलि तिल-जल समर्पित करते हैं। यह पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की निरंतर अभिव्यक्ति है।

  4. पुण्यतिथि पर धूप-दीप एवं संकल्प:

    माता-पिता की वार्षिक पुण्यतिथि पर घर में सात्विक भोजन बनाकर, दक्षिण दिशा में दीप प्रज्वलित कर, पितरों के निमित्त अग्नि में खीर की आहुति (धूप-ध्यान) अवश्य देनी चाहिए।

  5. भ्रांति का निवारण: ‘गया श्राद्ध के बाद घर पर श्राद्ध करने से दोष लगता है?’:

    यह धारणा पूर्णतः निराधार और शास्त्र-विरुद्ध है। शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है कि गया श्राद्ध के बाद घर पर किया गया पितृ-कर्म पूर्वजों को और अधिक आनंद व दिव्य तृप्ति प्रदान करता है, इसका कोई दोष नहीं लगता।

7. वार्षिक श्राद्ध और गया श्राद्ध के लिए प्रयुक्त सामग्रियों का भेद

  • घर के वार्षिक श्राद्ध में: मुख्य रूप से पके हुए सात्विक भोजन की थाली, खीर, पूड़ी, कव्य-हव्य सामग्री और नकद दक्षिणा।

  • गया महा-श्राद्ध में: शुद्ध बिना छाना हुआ जौ का आटा, पलाश/केले के पत्ते, काले तिल, कुशा की अंगूठी (पवित्री), गाय का कच्चा दूध, शहद, गंगाजल और 45+ वेदियों पर चरण-स्पर्श हेतु विशिष्ट अर्घ्य द्रव्य।

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हमने सपिंडीकरण के अभाव में त्रिपिंडी श्राद्ध का विधान, गया श्राद्ध के बाद घर पर वार्षिक श्राद्ध के 5 नियम, और सामग्रियों के भेद को विस्तार से समझा।)

8. गयाजी में श्राद्ध अनुष्ठान का सही समय, तिथियां और व्यावहारिक पंडा व्यवस्था

दशगात्र, सपिंडीकरण या वार्षिक तिथि के उपरांत गयाजी में महा-श्राद्ध संपन्न कराने के लिए शास्त्रसम्मत समय, शुभ मुहूर्त और पंडा व्यवस्था के व्यावहारिक नियमों को समझना अनिवार्य है:

  • श्राद्ध के लिए सर्वोत्तम काल:

    • पितृपक्ष (आश्विन कृष्ण पक्ष): इसे गया श्राद्ध का महापर्व माना जाता है। इस 16-दिवसीय अवधि में समस्त पितृगण गयाजी क्षेत्र में सूक्ष्म रूप से उपस्थित रहते हैं।

    • मासिक अमावस्या व अधिकमास (पुरुषोत्तम मास): प्रत्येक माह की सोमवती अमावस्या, भौमवती अमावस्या अथवा मलमास/अधिकमास में किया गया पिंडदान अनंत गुना फलदायी होता है।

    • कुतप और रौहिण काल: दिन का आठवां मुहूर्त ‘कुतप काल’ (प्रातः 11:30 AM से 12:20 PM) और नौवां मुहूर्त ‘रौहिण काल’ (12:20 PM से 1:15 PM) पिंडदान और तर्पण के लिए सर्वश्रेष्ठ समय होता है।

  • गया तीर्थ में काल-बाध्यता का अभाव:
    वायु पुराण का स्पष्ट निर्देश है—“न विचार्यो गयातीर्थे कालो वाऽप्ययनादिकम्” अर्थात् गयाजी में पिंडदान करने के लिए किसी अशुभ नक्षत्र, गुरु-शुक्र अस्त (तारा डूबना) या भद्रा का विचार नहीं किया जाता। यहाँ कदम रखते ही हर क्षण तीर्थ-काल बन जाता है।

  • पंडा बही-खाता एवं अनुष्ठान संकल्प:
    गयाजी पहुँचकर सबसे पहले अपने राज्य, जिले और गाँव के अधिकृत ‘गयावाल तीर्थ पुरोहित’ की गद्दी पर संपर्क करें। अपनी कुल वंशावली (बही-खाता) में अपने पूर्वजों के हस्ताक्षर/विवरण का मिलान कराएं और दशगात्र/सपिंडी की स्थिति स्पष्ट करके ही संकल्प ग्रहण करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions – FAQs)

Q1. यदि पिता के देहावसान को अभी केवल 6 महीने हुए हों, तो क्या पितृपक्ष में गयाजी जा सकते हैं?

उत्तर: यदि 12वें दिन ‘सपिंडीकरण’ संस्कार पूर्ण हो चुका है और परिवार में कोई गंभीर सूतक शेष न हो, तो विद्वान तीर्थ पुरोहित के मार्गदर्शन में ‘अपकर्ष सपिंडी’ का ध्यान रखते हुए पितृपक्ष में गयाजी पिंडदान कराया जा सकता है।

Q2. क्या सपिंडीकरण और गया श्राद्ध दोनों एक साथ गयाजी में हो सकते हैं?

उत्तर: यदि घर पर 12वें दिन सपिंडी नहीं हो पाई थी, तो गयाजी पहुँचकर पहले दिन ‘त्रिपिंडी श्राद्ध’ या ‘प्रायश्चित्त सपिंडी’ की जाती है ताकि प्रेत बाधा शांत हो, और उसके अगले दिन मुख्य गया महा-श्राद्ध (विष्णुपद, फल्गु, अक्षयवट) का अनुष्ठान किया जाता है।

Q3. क्या गयाजी में पिंडदान के बाद घर पर पितृपक्ष में ब्राह्मण भोजन कराना आवश्यक है?

उत्तर: जी हाँ। गया श्राद्ध के बाद घर पर पिंड बनाने की बाध्यता समाप्त हो जाती है, परंतु पितृपक्ष की तिथि पर जल-तर्पण, पंचबलि (गौ-ग्रास, श्वान, काक) और ब्राह्मण भोजन/सीधा दान कराना संतान का नित्य पितृ धर्म है।

Q4. क्या जीवित व्यक्ति अपने स्वयं के उद्धार के लिए भी गयाजी में श्राद्ध कर सकता है?

उत्तर: हाँ, इसे ‘आत्म-श्राद्ध’ (जीवच्छ्राद्ध) कहा जाता है। संन्यासी, निःसंतान व्यक्ति अथवा मोक्षाभिलाषी साधक जनार्दन मंदिर और विष्णुपद वेदी पर तीर्थ पुरोहित के सान्निध्य में अपने स्वयं के निमित्त भी पिंड अर्पण कर सकते हैं।

गया महा-श्राद्ध से पूर्व 5 मिनट की Quick Checklist

  • पूर्व संस्कारों की पुष्टि: दिवंगत परिजन के दशगात्र, एकादशाह और सपिंडीकरण की सही तिथि व विवरण नोट रखें।

  • गोत्र एवं 3 पीढ़ियों के नाम: पितृकुल (पिता, दादा, परदादा) और मातृकुल (नाना, परनाना) के शुद्ध नाम व गोत्र की सूची तैयार रखें।

  • आवश्यक पूजन सामग्री: कुशा की पवित्री, शुद्ध बिना छाना हुआ जौ का आटा, काले तिल, गंगाजल, शहद और गाय का घी।

  • वस्त्र शुद्धि: अनुष्ठान हेतु बिना सिला श्वेत सूती धोती-कुर्ता या गमछा साथ रखें।

  • तीर्थ पुरोहित संपर्क: गयाजी पहुँचने से पूर्व अपने कुल के अधिकृत गयावाल पंडा जी से समय व वेदी क्रम सुनिश्चित कर लें।

निष्कर्ष

सनातन धर्म में दशगात्र और सपिंडीकरण जहाँ जीवात्मा को ‘प्रेत’ से ‘पितर’ के पद पर प्रतिष्ठित करने वाले प्रारंभिक संस्कार हैं, वहीं गयाजी महा-श्राद्ध उस पितर को 21 कुलों सहित भवसागर से पार उतारकर ‘वैकुंठ’ का शाश्वत अधिकारी बनाने वाला अंतिम महा-यज्ञ है। वार्षिक श्राद्ध प्रतिवर्ष की कृतज्ञता है और गया श्राद्ध आत्मा की अक्षय तृप्ति का पावन द्वार है। शास्त्रसम्मत विधि से किया गया यह अनुष्ठान कुल को पितृ ऋण से मुक्त कर सुख, शांति और अखंड वंश वृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करता है।

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📌 GayaJi Maha-Shraddh & Sapindikarana Assistance

यदि आप गयाजी यात्रा के दौरान दशगात्र/सपिंडी उपरांत महा-श्राद्ध, त्रिपिंडी अनुष्ठान, विष्णुपद, फल्गु तट और अक्षयवट पर प्रामाणिक गयावाल तीर्थ पुरोहित के मार्गदर्शन में संपूर्ण विधि संपन्न कराना चाहते हैं:

लेखक के बारे में

यह जानकारी Gaya Digital Guide (निशांत) द्वारा तैयार की गई है। निशांत गयाजी के एक स्थानीय विशेषज्ञ, आध्यात्मिक ब्लॉगर और गया की धार्मिक परंपराओं के शोधकर्ता हैं। उनका एकमात्र मिशन gayajipind.in के माध्यम से गयाजी की शुद्ध धार्मिक परंपराओं, पौराणिक इतिहास और पिंडदान की सही जानकारी को देश-दुनिया के श्रद्धालुओं तक पहुँचाना है।

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डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी वायु पुराण, अग्नि पुराण और स्थानीय धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हमारा उद्देश्य श्रद्धालुओं तक सही पौराणिक इतिहास पहुँचाना है। पिंडदान और पूजा-पाठ के विधान हेतु हमेशा अपने मान्यता प्राप्त तीर्थ पुरोहित (गयावाल पंडा जी) का मार्गदर्शन लें।